तुर्की भूकंप मीडिया का सबसे बड़ा झूठ और रिक्टर स्केल का असली सच

तुर्की भूकंप मीडिया का सबसे बड़ा झूठ और रिक्टर स्केल का असली सच

5.4 तीव्रता का भूकंप आया। लोग डरकर घरों से बाहर भागे। चारों तरफ तबाही की आशंका। मुख्यधारा की मीडिया ने हमेशा की तरह एक ही घिसी-पिटी स्क्रिप्ट उठा ली है। सनसनीखेज हेडलाइंस, डर का माहौल और वही पुराना रोना। लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया आपको आधी अधूरी हकीकत परोसकर बेवकूफ बना रहा है।

हर बार जब धरती हिलती है, तो कैमरे तबाही ढूंढने निकल पड़ते हैं। कोई यह नहीं पूछता कि क्या वाकई 5.4 तीव्रता का भूकंप किसी देश को तबाह करने के लिए काफी है? जवाब है: बिल्कुल नहीं। अगर ढांचागत तैयारी सही हो, तो इतने कम प्रभाव का भूकंप रोजमर्रा की जिंदगी में एक मामूली रुकावट से ज्यादा कुछ नहीं होना चाहिए। मगर मीडिया को सनसनी बेचनी है, सुरक्षा नहीं।

रिक्टर स्केल की सबसे बड़ी गलतफहमी

लोग नंबर देखते हैं और डर जाते हैं। 5.4 सुनने में बड़ा लगता है, लेकिन भूकंप विज्ञान (Seismology) के नजरिए से यह एक मध्यम श्रेणी का झटका है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में हर साल 5.0 से 5.9 तीव्रता के लगभग 800 से ज्यादा भूकंप आते हैं। यह कोई दुर्लभ प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह पृथ्वी की एक सामान्य प्रक्रिया है।

भूकंप से होने वाला नुकसान सिर्फ तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। असली खेल तीन चीजों का है: गहराई (Depth), उपरिकेंद्र (Epicenter) की दूरी, और सबसे महत्वपूर्ण, बिल्डिंग कोड।

अगर 5.4 तीव्रता का भूकंप जमीन से 50 किलोमीटर नीचे आता है, तो सतह पर उसका असर न के बराबर होता है। लेकिन मीडिया कभी गहराई की बात नहीं करेगा। वे केवल रिक्टर स्केल का नंबर चिल्लाएंगे क्योंकि डरी हुई जनता ज्यादा क्लिक और ज्यादा व्यूज देती है। मैंने सालों तक आपदा प्रबंधन की रिपोर्टिंग और ग्राउंड जीरो का विश्लेषण किया है। जब भी इस तरह के मध्यम झटके आते हैं, नुकसान भूकंप नहीं, बल्कि खराब इंजीनियरिंग और घबराहट (Panic) की वजह से होता है।

जापान से क्यों नहीं सीखता कोई सबक

तोक्यो में 5.5 तीव्रता का भूकंप आना एक सामान्य मंगलवार जैसा है। वहां मेट्रो दो मिनट के लिए रुकती है, लोग अपने फोन देखते हैं और वापस काम पर लग जाते हैं। कोई सड़कों पर चीखते हुए नहीं भागता। वहीं दूसरी तरफ, तुर्की या विकासशील देशों के कुछ हिस्सों में यही तीव्रता दहशत का कारण बन जाती है।

यह प्रकृति का दोष नहीं है। यह सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता और घटिया निर्माण कार्य का परिणाम है।

जब आप कंक्रीट के नाम पर रेत और सीमेंट का गलत मिश्रण इस्तेमाल करते हैं, तो धरती का मामूली सा हिलना भी भारी पड़ता है। तुर्की ने 1999 के मारमारा भूकंप के बाद कड़े नियम बनाए थे। तथाकथित 'भूकंप टैक्स' भी वसूला गया। लेकिन नतीजा क्या रहा? जब जमीन हिलती है, तो भ्रष्टाचार की परतें खुलकर सामने आ जाती हैं। मीडिया सरकार और बिल्डरों के इस गठजोड़ पर सवाल उठाने के बजाय प्रकृति को विलेन बनाने में जुट जाता है।

घबराहट जान लेती है मलबे से ज्यादा

अक्सर भूकंप के दौरान चोट लगने या मौत होने का कारण इमारत का गिरना नहीं होता, बल्कि भगदड़ होती है। लोग बिना सोचे-समझे सीढ़ियों की तरफ भागते हैं। लिफ्ट का इस्तेमाल करने की बेवकूफी करते हैं। इमारतों से कूद जाते हैं।

सोचिए, एक ऐसी स्थिति जहां भूकंप के झटके केवल 10 सेकंड के लिए आए। इमारत पूरी तरह सुरक्षित है, लेकिन बाहर भागने की होड़ में कांच टूटने या गिरने से दर्जनों लोग घायल हो जाते हैं। मीडिया इसे 'भूकंप का कहर' कहकर चलाएगा। यह कहर भूकंप का नहीं, जागरूकता की कमी का है।

जनता को यह सिखाना बंद करना होगा कि भूकंप आते ही भागना है। उन्हें यह सिखाना होगा कि 'ड्रॉप, कवर और होल्ड ऑन' कैसे करते हैं। मजबूत मेज के नीचे छिपना सड़कों पर बदहवास भागने से हजार गुना बेहतर रणनीति है।

क्या भूकंप की भविष्यवाणी संभव है

इंटरनेट पर बैठे स्वघोषित विशेषज्ञ हर हफ्ते दावा करते हैं कि वे भूकंप की भविष्यवाणी कर सकते हैं। कोई ग्रहों की चाल को दोष देता है, तो कोई जंगली जानवरों के व्यवहार को।

सच्चाई को सीधे तौर पर समझ लीजिए: आज की तारीख में दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक या तकनीक यह नहीं बता सकती कि किस सटीक दिन, किस समय और कहां भूकंप आएगा। जो ऐसा दावा करता है, वह धोखेबाज है।

हम केवल फॉल्ट लाइन्स (Fault Lines) का अध्ययन करके जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं। तुर्की अनाटोलियन प्लेट पर स्थित है, जो इसे दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्रों में से एक बनाता है। वहां भूकंप आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आश्चर्य इस बात पर होना चाहिए कि इस वैज्ञानिक सच को जानने के बाद भी वहां की इमारतें ताश के पत्तों की तरह क्यों व्यवहार करती हैं।

रियल एस्टेट और आपदा का बिजनेस मॉडल

यह पूरा खेल पैसे का है। सख्त नियमों का पालन करने में बिल्डरों की लागत बढ़ती है। अधिकारियों को रिश्वत देना नियमों का पालन करने से सस्ता पड़ता है। जब भूकंप आता है, तो नुकसान की भरपाई बीमा कंपनियां और सरकारी राहत कोष करते हैं। यानी टैक्सपेयर्स का पैसा।

इस चक्र को तोड़ने का एकमात्र तरीका है कि कंस्ट्रक्शन कंपनियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। अगर 5.4 तीव्रता के झटके में किसी इमारत में दरार आती है, तो उस इमारत के इंजीनियर और आर्किटेक्ट को तुरंत जेल भेजा जाना चाहिए। इसे प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानव-निर्मित लापरवाही माना जाना चाहिए।

नुकसान के डर को पूरी तरह खत्म करने का दावा करना बेईमानी होगी। भूकंपीय इंजीनियरिंग की भी अपनी सीमाएं हैं। एक बेहद शक्तिशाली भूकंप (जैसे 7.5 या उससे अधिक) सबसे बेहतरीन डिजाइनों को भी चुनौती दे सकता है। लेकिन 5.4 जैसी मध्यम तीव्रता के मामले में नुकसान की गुंजाइश शून्य होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो रहा है, तो सिस्टम में खराबी है, पृथ्वी की प्लेटों में नहीं।

अगली बार जब आप टीवी पर 'भूकंप से कांपी धरती' जैसी सनसनीखेज हेडलाइन देखें, तो डरने के बजाय अपनी खुद की इमारत के पिलर्स को देखिए। यह जांचिए कि आपके शहर का म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन बिल्डिंग बायलॉज को कितना संजीदगी से लागू कर रहा है। मीडिया के फैलाए डर के झांसे में आना बंद कीजिए। सवाल प्रकृति से नहीं, अपने स्थानीय प्रशासन और बिल्डर से पूछिए। अपनी सुरक्षा के लिए डरावनी खबरों पर निर्भर रहना छोड़िए और बुनियादी ढांचे की जवाबदेही तय कीजिए।

RR

Riley Russell

An enthusiastic storyteller, Riley Russell captures the human element behind every headline, giving voice to perspectives often overlooked by mainstream media.