शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद लगा था कि बांग्लादेश में सब कुछ ठीक हो जाएगा। नई अंतरिम सरकार आई। मोहम्मद यूनुस ने कमान संभाली। दुनिया भर में लोकतंत्र की दुहाई दी गई। लेकिन ढाका की सड़कों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक जमीन पर कुछ नहीं बदला। अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा की तस्वीरें आज भी उतनी ही खौफनाक हैं जितनी अगस्त के उस उथल-पुथल वाले हफ्ते में थीं।
जब हम बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विश्लेषण करते हैं, तो डेटा डराने वाला मिलता है। मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट साफ बताती है कि इस साल अब तक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के 505 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। ये सिर्फ वो आंकड़े हैं जो सामने आ पाए हैं। असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में रिपोर्ट दर्ज कराना खुद में एक बड़ी चुनौती है।
बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा का पूरा सच
सुरक्षा का दावा खोखला साबित हो चुका है। जब सरकार बदली, तो लगा कि कानून-व्यवस्था सुधरेगी। मगर हकीकत यह है कि कट्टरपंथी तत्वों को खुली छूट मिल गई। बांग्लादेश जातीय हिंदू महाजोत और अन्य स्थानीय संगठनों की रिपोर्ट के मुताबिक, हमलों का यह सिलसिला थमा नहीं है। दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों पर हमले हुए, मूर्तियों को तोड़ा गया और डराया-धमकाया गया।
यह कोई राजनीतिक बदलाव का साइड इफेक्ट नहीं है। यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है। हिंसा का पैटर्न पुराना है पर तरीके नए हैं। अब केवल शारीरिक हमले नहीं हो रहे। हिंदुओं को उनकी नौकरियों से जबरन इस्तीफा देने पर मजबूर किया जा रहा है। सरकारी विभागों, स्कूलों और कॉलेजों में काम करने वाले हिंदू शिक्षकों और अधिकारियों को निशाना बनाया जा रहा है। उनसे जबरन दस्तखत लिए जा रहे हैं।
आंकड़ों की जुबानी सुनिए जमीन की हकीकत
इस साल दर्ज हुए 505 मामलों को अगर आप करीब से देखेंगे, तो समझ आएगा कि डर का माहौल किस कदर हावी है। इन मामलों में केवल तोड़फोड़ शामिल नहीं है।
- जमीन पर अवैध कब्जे के दर्जनों मामले सामने आए हैं।
- व्यापारियों से जबरन वसूली की जा रही है।
- धार्मिक स्थलों को निशाना बनाकर समुदाय की आस्था पर चोट की जा रही है।
ढाका के जानकारों का कहना है कि पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। जब थानों पर हमले हुए, तो पुलिस खुद अपनी जान बचाने में लगी थी। ऐसे में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा कौन देता? नई सरकार ने वादे तो बहुत किए, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कोई असर नहीं दिखा।
क्यों बेअसर साबित हो रही है अंतरिम सरकार
मोहम्मद यूनुस ने वैश्विक मंचों पर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का भरोसा दिलाया। उन्होंने ढाका के प्रसिद्ध ढाकेश्वरी मंदिर का दौरा भी किया। तस्वीरें खिंचवाईं। बयान जारी किए। पर क्या इससे कट्टरपंथियों में कोई खौफ पैदा हुआ? बिल्कुल नहीं।
प्रशासनिक शिथिलता इसका सबसे बड़ा कारण है। पुलिस तंत्र पूरी तरह से पंगु हो चुका है। कट्टरपंथी संगठनों का मनोबल बढ़ा हुआ है क्योंकि उन्हें लगता है कि नई व्यवस्था में उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर ये तत्व अपनी जड़ें और मजबूत कर रहे हैं।
वैश्विक समुदाय की चुप्पी और भारत का रुख
इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया के बड़े देशों का रवैया निराशाजनक रहा है। मानवाधिकारों की बात करने वाले पश्चिमी देश इस मुद्दे पर खुलकर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। भारत ने जरूर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कई बार बांग्लादेश सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा है।
यह केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं है। इसका सीधा असर पूरे दक्षिण एशिया की भू-राजनीति और सुरक्षा पर पड़ता है। जब किसी एक समुदाय को लगातार प्रताड़ित किया जाता है, तो पलायन की स्थिति पैदा होती है। सीमावर्ती इलाकों में इसका दबाव साफ महसूस किया जा सकता है।
क्या है आगे का रास्ता
हालात को सुधारने के लिए केवल बयानों से काम नहीं चलेगा। अंतरिम सरकार को सख्त कदम उठाने होंगे। सबसे पहले हिंसा के आरोपियों के खिलाफ त्वरित अदालतों में मुकदमा चलाकर सजा देनी होगी। जब तक अपराधियों में कानून का डर नहीं होगा, तब तक ऐसी घटनाएं रुकने वाली नहीं हैं।
स्थानीय स्तर पर सुरक्षा समितियों का गठन किया जाना चाहिए जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को भी शामिल किया जाए। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों को जमीन पर जाकर स्वतंत्र जांच करनी चाहिए ताकि सच दुनिया के सामने आ सके। अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बांग्लादेश में बचे-खुचे अल्पसंख्यक भी खुद को पूरी तरह असुरक्षित महसूस करने लगेंगे।